Saturday, August 21, 2010

ग़ज़ल

हम उनको नादां
समझाने की भूल कर गए.
वो हमारी जीस्ते-तरक्की१ में 
तन के शूल बन गए.
 ये बात वो एक रात 
मयखाने में कबूल कर गए.
तब हमें ये इल्म हुआ 
किसे हम अपना रसूल२ कर गए.
मेरा इरफ़ान३ कहीं सो गया था
औ' वो हमारी किस्मत धूल कर गए.
सब कुछ दे दिया था उनको 
अपनी रश्कों से हमारा मक्तूल४ कर गए.

१- जीवन की प्रगति
२- नबी
३- विवेक
४- कत्ल

प्रबल प्रताप सिंह

3 comments:

  1. .बहुत सुंदर ग़ज़ल...

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  2. जनाब!गजल कहने में भी आप काफी’प्रबल’हॆं.आपका ’प्रताप’ब्लाग जगत में इसी प्रकार बना रहे.शुभकामनाओं के साथ.

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  3. बहुत कम लिखते हैं आप.
    कृपया अपनी सक्रियता को बढाते हुए थोड़ा ज्यादा लिखा करे.
    धन्यवाद.
    WWW.CHANDERKSONI.BLOGSPOT.COM

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