Saturday, January 23, 2010

तरुणाई के सपने











आज आज़ाद हिंद फौज के मुखिया सुभाष चन्द्र बोस का जन्म दिन है. देश को आज़ादी दिलाने में इनके अप्रतिम योगदान को भला कोई कैसे भुला सकता है. खासकर युवा. वो युवा जिनकी हर देश के उत्थान और सृजन में अहम भूमिका रहि है. उन्हीं के शब्दों में पढ़िए तरुणाई के सपने...
हम इस संसार में किसी उद्देश्य की सिद्धि के लिए, किसी सन्देश को प्रचारित करने के लिए जन्म ग्रहण करते हैं. जगत को ज्योति प्रदान करने के लिए आकाश में यदि सूर्य उदित होता है, वन प्रदेश में सौरभ बिखेरने को यदि दालों में फूल खिलते हैं और अमृत बरसाने को नदियां यदि समुद्र की ओर बह चलती हैं तो हम भी यौवन का परिपूर्ण आनंद और प्राणों का उत्साह लेकर मृत्युलोक में किसी सत्य की प्रतिष्ठा के लिए आए हैं. जो अज्ञात एवं महत उद्देश्य हमारे व्यर्थतापूर्ण जीवन को सार्थक बनाता है, उसे चिंतन एवं जीवन-अनुभव द्वारा पाना होगा.











सभी को आनंद का आस्वाद कराने के लिए हम यौवन के पूर्ण ज्वार में तैरते आएं हैं. कारन, हम आनंद स्वरुप है. आनंदमय मूर्त विग्रह के रूप में इस मर्त्य में हम विचरण करेंगे. अपने आनंद में हम हंसेंगे-साथ ही जगत को भी मतवाला बनाएंगे. जिधर हम विचरेंगे उधर निरानंद का अन्धकार लज्जा से दूर हट जाएगा. हमारे स्फूर्त स्पर्श के प्रभाव-मात्र से रोग, शोक, ताप दूर होंगे.
इस कष्टमय, पीड़ापूर्ण नरकधाम में हम आनद-सागर के ज्वार को खींच लाएंगे.







आशा, उत्साह, त्याग और पुरुषार्थ हममें है. हम सृष्टि करने आएं हैं. क्योंकि सृष्टि में ही आनंद है. तन, मन, बुद्धिबल से हमें सृष्टि करनी है. जो अन्तर्निहित सत्य है, जो सुन्दर है, जो शिव है- उसे सृष्टि पदार्थों में हम प्रस्फुटित करेंगे. आत्मदान में जो आनंद है, उस आनंद में हम खो जाएंगे. उस आनंद का अनुभव कर पृथ्वी भी धन्य हो उठेगी. फिर भी हमारे देय का अंत नहीं है, कर्म का भी अंत नहीं हैं है, क्योंकि----
" जतो देबो प्राण बहे जाबे प्राण
  फुराबे ना आर प्राण;
  एतो कथा आछे, एतो गान आछे
  एतो प्राण आछे मोर;
  एतो सुख आछे, एतो साध आछे
  प्राण हए आछे मोर."
अनंत आशा, असीम उत्साह: अपरिमित तेज़ और अदम्य साहस लेकर हम आएं हैं, इसलिए हमारे जीवन का स्रोत कोई नहीं रोक पाएगा. अविश्वास और नैराश्य का विशाल पर्वत ही क्यों न सम्मुख खड़ा हो अथवा समवेत मानवजाति की प्रतिकूल शक्तियों का आक्रमण ही क्यों न हो, हमारी आनंदमयी गति चिर अक्षुण रहेगी.







हम लोगों का एक विशिष्ट धर्म है, उसी धर्म के हम अनुयायी हैं. जो नया है, जो सरस है, जो अनास्वादित है, उसी के हम उपासक हैं. प्राचीन में नवीनता को, जड़ में चेतना को, प्रौढ़ों में तरुण को और बंधन के बीच असीम को हम ला बैठाते हैं. हम अतीत इतिहास-लब्ध ज्ञान को हमेशा मानने को तइयार नहीं हैं. हम अनंत पथ के यात्री अवश्य हैं, किन्तु हमें अजाना पथ ही भाता है- अजाना भविष्य ही हमें प्रिय है. हम चाहते हैं- ' द राइट टु मेक ब्लंडर्स ' अर्थात ' भूल करने का अधिकार.' तभी तो हमारे स्वभाव के प्रति सभी सहानुभूतिशील नहीं होते. हम बहुतों के लिए रचना-शून्य और श्रीविहीन हैं.
यही हमारा आनंद और यही हमारा गर्व है. तरुण अपने समय में सभी देशों में रचना-शून्य रहा और श्रीविहीन रहा है. अतृप्त आकांक्षा के उन्मांद में हम भटकते हैं, विज्ञों के उपदेश सुनने तक का समय हमारे पास नहीं होता. भूल करते हैं, भ्रम में पड़ते हैं, फिसलते हैं, किन्तु किसी प्रकार भी हमारा उत्साह घटता नहीं और न हम पीछे हटते हैं. हमारी तांडव-लीला का अंत नहीं है, क्योंकि हम अविराम-गति हैं.
हम ही देश-विदेश के मुक्ति-इतिहास की रचना करते हैं. हम यहां शान्ति का गंगाजल छिड़कने नहीं आते. हम आते हैं द्वंद्व उत्पन्न करने,  संग्राम का आभास देने, प्रलय की सूचना देने. जहां बंधन है, जहां जड़ता है, जहां कुसंस्कार है, जहां संकीर्णता है, वहीं हमारा प्रहार होता है. हमारा एकमात्र काम है मुक्तिमार्ग को हर क्षण कण्टक शून्य बनाए रखना, जिससे उस पथ पर मुक्ति-सेनाएं अबाधित आवागमन कर सकें.
मानव-जीवन हमारे लिए एक अखंड सत्य है. अतः जो स्वाधीनता हम चाहते हैं- उस स्वाधीनता को पाने के लिए युगों-युगों से हम खून बहाते आते हैं- वह स्वाधीनता हमारे लिए सर्वोपरि है. जीवन के सभी क्षेत्रों में, सभी दिशाओं में हम मुक्ति-सन्देश प्रचारित करने को जन्में हैं, चाहे समाजनीति हो, चाहे अर्थनीति, चाहे राष्ट्रनीति या धर्मनीति- जीवन के सभी क्षेत्रों में हम सत्य का प्रकाश, आनंद का उच्छ्वास और उदारता का मौलिक आधार लेकर आते रहे हैं.
अनादिकाल से हम मुक्ति का संगीत गुंजाते आए हैं. बचपन से मुक्ति की आकांक्षा हमारी नसों में प्रवाहित है. जनम लेते ही हम जिस कातर कंठ से रो पड़ते हैं, वह मात्र पार्थिव बंधन के विरुद्ध विद्रोह का ही एक स्वर है. बचपन में रोना ही एकमात्र सहारा है. किन्तु यौवन की देहरी पर क़दम रखते ही बाहु और बुद्धि का सहारा हमें मिलता है. और इसी बुद्धि और बाहु की सहायता  से हमने क्या नहीं किया-फिनीसिया, असीरिया, बैबीलोनिया, मिस्र, ग्रीस, रोम, तुर्की, इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी, रूस, चीन, जापान, हिन्दुस्तान- जिस- किसी देश के इतिहास के पृष्ठों में हमारी कीर्ति जाज्वल्यमान है. हमारे सहयोग से सम्राट सिंहासनासीन होता है और हमारे इशारे पर वह सभय सिंहासन से उतार दिया जाता है. हमने एक तरफ़ पत्थर-अभिभूत प्रेमाश्रु रूपी ताजमहल का जैसे निर्माण किया है, वैसे ही दूसरी तरफ़ रक्त- स्रोत से धरती की प्यास बुझायी है. हमारी सामूहिक क्षमता से ही समाज, राष्ट्र, साहित्य, कला, विज्ञान युग-युगों में देश-देश में विकसित होता रहा है. और रूद्र कराल रूप धारण कर हमने जब तांडव आरम्भ किया, तब उसी तांडव के मात्र एक पद-निक्षेप से कितने ही समाज, कितने ही साम्राज्य dhool में मिल गए.



                         



इतने दिनों के बाद अपनी शक्ति का अहसास हमें हुआ है, अपने कर्म का ज्ञान हमें हुआ है. अब हमारे ऊपर शासन और हमारा शोषण भला कौन करे ? इस नव जागरण बेला में सबसे महत सत्य है- तरुणों की आत्म- प्रतिष्ठा की प्राप्ति. तरुणों की सोयी आत्मा जब जाग गयी है तब जीवन के चतुर्दिक सभी स्थलों में यौवन का रक्तिम राग पुनः दिख उठेगा. यह जो युवकों का आन्दोलन है- यह जैसे सर्वतोमुखी है, वैसे ही विश्वव्यापी भी. आज संसार के सभी देशों में, विशेषतः जहां बुढ़ापे की शीतल छाया नजर अति है, युवा सम्प्रदाय सर उठाकर प्रकृतिस्थ हो सदर्प मुहिम पर है. किस दिव्य आलोक से पृथ्वी को ये उदभासित करेंगे, कौन जाने ? ओ मेरे तरुण साथियों, उठो, जागो, उषा की किरण वह वहां फैल रही है.
                                                                        २ ज्येष्ठ, १३३०
                                                                       ( सन १९२३ ई.)       
प्रबल प्रताप सिंह

Thursday, January 14, 2010

साहित्य के अमृत...!











आज साहित्य की दुनिया के एक अमृत शिक्षाशास्त्री, प्रशासक, चिन्तक-विचारक, साहित्यकार, भाषाविद, सम्पादक आचार्य पंडित विद्यानिवास मिश्र जी का जन्म दिवस है.साहित्य के इस अमृत पुत्र के बारे में संभवतः सभी लोग जानते होंगे. मिश्रजी के बारे में उनके वरिष्ठ, कनिष्ठ और सहोदर क्या सोचते थे. उन्हीं कुछ लोगों की स्मृतियों को यहाँ प्रस्तुत कर उनके जन्मदिवस पर उनको अपनी श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूं.
विद्या ने जिसमें किया निवास
वरदपुत्र वह वरदा का था.
पंडित प्रवर विद्यानिवास,
अर्जक विद्वत जन-विश्वास.
वाणी के हे वरद पुत्र तुम!
दिव्य लोक में हुए मगन.
तेरी सेवा में अर्पित,
ये श्रद्धा के मेरे पुनीत सुमन.( कन्हैयालाल पाण्डेय " रमेश ")

पंडित विद्यानिवास मिश्र जी का जीवन-वृत्त 
 पूरा नाम-  विद्यानिवास मिश्र
माता का नाम-  श्रीमती गौरी देवी
पिता का नाम-  पंडित प्रसिद्ध नारायण मिश्र
जन्म-   १४ जनवरी, १९२६
जन्म स्थान-  पकड़डीहा, गोरखपुर ( उ. प्र.)
प्राथमिक शिक्षा-   बिसुनपूरा प्राथमिक विद्यालय, गोरखपुर
माध्यमिक शिक्षा-  गोरखपुर
उच्च शिक्षा-   इलाहाबाद, वाराणसी


सेवा की शुरुआत 
१. १९४६ से १९४८ तक- साहित्य सम्मलेन प्रयाग और आकाशवाणी  इलाहाबाद.

२. १९४८ से १९५० तक- महापंडित राहुल सांकृत्यायन के साथ हिन्दी-अंग्रेजी शब्दकोश के लिए कार्य.

३. १९५१ से १९५२ तक- सूचना अधिकारी, विन्ध्य प्रदेश.

४.१९५४ से १९५६ तक- उत्तर प्रदेश सरकार में सूचना निदेशक.

५. १९५७ से १९६७ तक- संस्कृत विभाग, गोरखपुर विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफ़ेसर एवं रीडर.

६. १९६० से १९६१ एवं १९६७ से १९६८ तक- कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में अथिति प्रोफ़ेसर.

७. १९६८ से १९७६ तक- सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में आधुनिक भाषा एवं भाषा विभाग में प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष.

८. १९७७ से १९८५ तक- कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी संस्थान, आगरा में निदेशक.

९. १९८५ से १९८६ तक- बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में अतिथि प्रवक्ता.

१०. १९८६ से १९८९ तक- काशी विद्यापीठ के कुलपति.

११. १९९० से १९९२ तक- संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति.

१२. १९९२ से १९९४ तक- प्रधान सम्पादक, ' नव भारत टाइम्स '

१३. अगस्त १९९५ से फरवरी २००५ तक- प्रधान सम्पादक, ' साहित्य अमृत '.

१४. १९९९ से २००३ तक- प्रसार भारती बोर्ड के सदस्य.

१५. २००१ से २००४ तक- इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के न्यासी.

१६. २८ अगस्त २००३- भारत के राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा में मनोनीत.
१७. आजन्म न्यासी- भारतीय ज्ञानपीठ एवं वत्सल निधि.

१८. कुलाधिपति- हिन्दी विद्यापीठ, देवघर ( झारखण्ड ).


अलंकरण-सम्मान-पुरस्कार
१. १९८७- मूर्ति देवी पुरस्कार.

२. १९८८- पदम् श्री.

३. १९९६- विश्व भारती सम्मान.

४. १९९६- साहित्य अकादमी महत्तर सदस्यता.

५. १९९७- शंकर सम्मान.

६. १९९७-भारत भारती.

७. १९९८- पद्म भूषण.

८. २००१- मंगला प्रसाद पारितोषिक.

प्रयाण- १४ फरवरी, २००५.

यादों के झरोखों से
" प्रत्येक मार्ग के किनारों पर वृक्ष हैं और हर मार्ग में पथिक उनका आश्रय लेते हैं, किन्तु ऐसा वृक्ष बिरला ही होता है जिसका स्मरण घर पहुंचकर भी पथिक कृतज्ञता से करता है. मेरे मित्र और गुरु भाई विद्यानिवास मिश्र ऐसे ही लाखों में एक वृक्ष थे जिनको साहित्य का संसार और समुदाय कई पीढ़ियों तक स्मरण करेगा. ' छान्दोग्योपनिषद ' में एक सार्थक मन्त्र-वाक्य है- ' स्मरोववकाशाद्ध भूयः '. अर्थात स्मरण आकाश से भी उत्कृष्ट है. ' साहित्य अमृत ' के प्रत्येक अंक और पृष्ठ पर उनकी स्मृति अंकित रहेगी."...लक्ष्मीमल्ल सिंघवी.
"बहुत कम लोगों का नाम इतना सार्थक होता है जितना सार्थक पं. विद्यानिवास मिश्र का था. विद्या सचमुच उनमें निवास करती थी. आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता था उनके ज्ञान को देखकर. वह जितना विस्तृत था उतना ही गहरा भी था. वेदों से प्रारंभ कर आधुनिक कविता तक, पाणिनीय व्याकरण से लेकर पश्चिमी भाषा विज्ञान तक, लोकजीवन की मार्मिक अंतर्दृष्टि-सम्पन्नता से लेकर गहन शास्त्र-विचारणा तक उनकी सहज गति थी. जिस त्वरित गति से उनकी लेखनी चलती थी, उसी वेग से उनकी वाणी भी अमृत बरसाती थी."...विष्णुकांत शास्त्री.
" एक दिन बातों-ही-बैटन में भारती जी को याद करके मैं काफी बिलबिला कर रो पड़ी. पहले तो प्यार से समझाते रहे पर रोना रुक नहीं पा रहा था तो ज़रा कड़े स्वर में डांटते हुए बोले, " अब बस एकदम चुप हो जाओ और सुनो, तुम्हें एक कथा सुनाते हैं, ध्यान से सुनो. और उन्होंने बताया कि एक बार राधा के मन में आया कि मथुरा जाकर कान्हा को देख आएं. संदेशा भेज दिया. अब महाराज कृष्ण की तो सिट्टी-पिट्टी गुम! कहीं कुछ ऐसा ना हो जाए कि राधा किसी बात से आहत हो जाएं, यहां कृष्ण उन्हें मना भी तो नहीं सकेंगे, बहुत सोच-समझकर उन्होंने स्वयं रुक्मिणी को पूरा जिम्मा दे दिया और कहा, आप स्वयं अपनी देखरेख में राधा के सम्मान और सुविधा का ख्याल रखिएगा, कहीं कोई कोर-कसर न रहने पाए. राधा आईं. रुक्मिणी ने सोचा, ग्वालन हैं, दूध-दही से ही उनका स्वागत होना चाहिए, सो उन्होंने स्वयं अपनी देखरेख में दूध को खूब औखवाया और लाल-लाल सोंधा-सोंधा खूब मलाईदार गरम-गरम दूध स्वयं उनको देने गईं. राधा ने भी उनका मान रखा और एकदम तत्ता गरम दूध एक सांस में पी गईं. सारे दिन खूब गहमागहमी रही. रात को राधा लौट गईं तब थके-मांदे कृष्ण अपने शयन कक्ष में गए. हमेशा की तरह रुक्मिणी उनके पाँव दबाने लगीं. पाँव दबाते जब वह तलवों के पास आईं तो कृष्ण ने अपने पाँव खींच लिए. रुक्मिणी ने सोचा, आखिर ऐसा मैंने क्या कर दिया ये यों नाराजगी दिखा रहे हैं. पूछने पर पता चला कि नाराजगी की बात नहीं है, बात यह है कि कृष्ण के पैरों में तलवों में चाले पड़े हैं, दबाने पर दर्द होगा. चाले कैसे पद गए ? पूछने पर पता चला कि राधा के हृदय में इन पैरों का अहर्निश निवास रहता है, दूध इतना गरम था कि एक सांस में पीने पर राधा की छाती जलने लगी और उन तलवों पर चाले पद गए.......कथा सुनाकर पंडित जी बोले "हम क्या जानते नहीं हैं कि कितनी प्राणप्रिया रही हो तुम भारती की. तुम रोओगी तो तुम्हारे इन आंसुओं में डूबकर उसकी आत्मा कितनी छटपटाएगी, इसका कुछ अंदाज़ है तुम्हें! खबरदार यों रो-रोकर भारती को कष्ट पहुंचाने का कोई हक़ नहीं है तुम्हें! " फिर बड़े दुलार से सर पर हाथ फेरकर बोले, " पगली! जनता हूं कि गीली लकड़ी की तरह धुंधुआती हुई नहीं जल रही हो. तुम तो दीए की बत्ती की तरह जल रही हो, जिसकी उजास में भारती की कीर्ति और उजली होकर चमक रही है. भारती की स्मृति संवर्धन के जिस काम में तुमने खुद को खपा दिया है, रोना-धोना छोड़कर उसी काम में लगी रहो. काम में ही अवसाद और विषाद, दोनों बिसरते हैं."...पुष्पा भारती.
" जब " साहित्य अमृत " पत्रिका निकलनी शुरू हुई तो विद्यानिवास जी रचना के लिए स्वयं फोन करते थे. उनकी बात को न मानना मेरे लिए मुश्किल था. इसलिए हमेशा मेरी रचनाएं विशेषांक में मौजूद होतीं. उनके स्वर्गवासी हो जाने का जहां मलाल था वहीं यह अहसास भी कि अब कोई फोन पर नहीं कहेगा-' नासिरा अपनी कहानी भेजो...अंक रुका हुआ है. "...नासिरा शर्मा.
 "भोजपुरी संस्कार गीतों में बेटी की विदाई के कुछ गीत जितने मर्मस्पर्शी हैं उतने ही अर्थवान भी. उन्हें ठीक से परखा और संजोया जाए तो वे विश्व-साहित्य की अनमोल निधि बनने का सामर्थ्य रखते है.
पंडित जी का अत्यंत प्रिय विदाई गीत था-----
बाबा, निमिया के डाल  जनि काटहू
बाबा, निमिया चिरइया बसेर
डाल  जनि काटहू...!
आगे की पंक्तियाँ उन्हें बिसर गईं थीं, पास बैठी अम्मा ने उस गीत को पूरा किया था-----
बाबा, सबेरे चिरइया उड़ी जइहैं,
रहि जइहैं निमिया अकेलि
डाल जनि काटहू
बाबा, बिटिया दुःख जनि देहू 
बाबा, सबेरे बिटिया जइहैं सासुर 
रहि जइहैं माई अकेलि 
बिटिया दुःख जनि देहू.
मेरे बाबा, नीम की डाल मत काटना. उस पर चिड़ियों का बसेरा है. डाल कटेगी, चिड़िया उड़ जाएंगी, नीम अकेली रह जाएगी.
मेरे बाबा, बिटिया को कभी दुःख मत देना. बेटी ससुराल जायेगी, माई अकेली रह जाएगी.
पंडित जी का वह रूप मेरी आत्मा में भोजपुरिया पिता के नेह-छोह की अमिट निशानी बनकर सुरक्षित है."...रीता शुक्ल 

मानिक मोर हेरइलें
" भोजपुरी में लिखे के मन बहुते बनवलीं त एकाध कविता लिखलीं, एसे अधिक ना लिखी पवलीं. कारन सोचीलें त लागेला जे का लिखीं, लिखले में कुछ रखलो बा! आ फेरो कइसे लिखीं ? मन से न लिखल जाला ! आ मन-मानिक होखो चाहे ना होखो- हेरइले रहेला, बेमन से लिखले में कवनों रस नइखे. घरउवां चइता के बोल: " जमुना के मटिया; मानिक मोर हेरइलें हो रामा...! हमार घूंघुची अइसन मन बेमन से पहिरावल फूलन के माला में हेरात रहेला. जवन ना चाहि लें तवन करे के परेला लोगन के मन राखे खातिर. जवन कइल चाहि लें तवना खातिर एक्को पल केहू छोड़े देबे के तइयार नाहीं. लोक के चिंता जीव मारत रहेला. मनई जेतने लोक क होखल चाहेला, लोक ओतने ओके लिलले जाला. चल  चारा पवलीं नाहीं; बड़ा नरम चारा बा. एह लोक के कोसे चलीलें त एक मन बादा ताना मारेला--ए बाबू ! तुहीं त एके सहकवल, अब काहें झंखत हव ! बतिया ओहू सही बा--सहकावल त हमरे ह, लोक-लोक हमहीं अनसाइल कईलीं. देखीलें लोक केहू क होला नाहीं, जेतना ले ला ओकर टुकड़ो नाहीं देला. निराला जी के गीत बा ' व देती थी. सबके दांव बंधु', हाम्रो जिनगी सबके दानवे दिहले में सेरा अ गइलि, हमार दांव केहू देई, ई एह जनम में त होखे वाला नाहीं बा !"...( 'गिर रहा है आज पानी' से )
                                   ( साभार: स्मृति अंक, साहित्य अमृत, मार्च-अप्रैल,२००५ )
प्रबल प्रताप सिंह

Tuesday, January 12, 2010

ये आग कब बुझेगी...??





















                          घटना - एक 
टेस्ट ट्यूब बेबी को गर्भ में मारने की कोशिश,
           डाक्टर पिता गिरफ्तार
कानपुर,( मेआसु  ). लाला लाजपत राय अस्पताल में कार्यरत डाक्टर नीना मोहन रायजादा ने छह दिसम्बर को महिला थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि पति डाक्टर मनीष मोहन, सास, ससुर मदन मोहन सक्सेना और ननद डाक्टर ज्योत्सना मोहन व रश्मि सक्सेना ( दोनों बहनें शादी शुदा हैं और बच्चों के साथ मायके में ही रह रही हैं ) ने उसे बुरी तरह से पीटकर भ्रूण को नष्ट करने का प्रयास किया. भादंवि की धारा ४९८ ए, ३२३ और ३१६/५११ के तहत रिपोर्ट लिखी गई. इस रिपोर्ट में पीड़िता ने कहा कि उनके गर्भ में करीब सात हफ़्ते का भ्रूण है जो टेस्ट ट्यूब बेबी है. इस बेबी के लिए उन्होंने छह लाख रुपए खर्च किए हैं जिसमें पति ने एक रुपए नहीं दिए. दहेज़ की मांग पूरी नहीं होने पर सास ससुर, पति व ननदों ने बीते नौ नवम्बर और फिर पंद्रह नवम्बर को उसे बुरी तरह पीटा जिससे रक्तस्राव होने लगा और भ्रूण नष्ट होते-होते बचा. इससे पहले भी ससुरालवालों ने उन्हें पीटकर तीन माह के गर्भस्थ शिशु की जान ले ली थी. दो साल पहले उन्होंने तलाक का मुकदमा भी दाखिल किया था जो अदालत ने खारिज कर दिया था. उनकी शादी चार साल पहले हुई थी. उसी के बाद ससुरालवालों के जुल्म और बढ़ गए थे. महिला थानाध्यक्ष की आगुवाई वाली टीम ने सोमवार(११-०१-१०) को डा. मनीष मोहन को घर से गिरफ़्तार कर लिया. ताजा घटनाक्रम के बाद आरोपी ससुरालीजन भूमिगत   भूमिगत हो गए. पुलिस ने मुख्य आरोपी को कोर्ट में पेश किया जहां से उन्हें चौदह दिन की न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया गया.

घटना-दो

दहेज़ लोभियों ने वधू को जलाया, हालत गंभीर








कानपुर, ( मेआसु ). बच्चा न होने तथा दहेज़ की मांग पूरी न होने पर चकेरी क्षेत्र में एक महिला को उसके ससुरालवालों ने जला दिया और फरार हो गए. मकर संक्रांति पर खिचड़ी देने पहुंचे भाई को मामले की जानकारी हुई. महिला को शहर के उर्सला अस्पताल में भारती कराया गया है. हालात गंभीर बनी हुई.
छोटी गुटैया स्वरुप नगर निवासी चंदू प्रसाद यादव ने अपनी पुत्री उमा ( ३२ वर्ष ) की शादी चार साल पहले श्याम नगर नटियन चकेरी निवासी कार चालक राजेन्द्र यादव के साथ की थी.सोमवार ( ११-०१-१० ) सुबह उमा का छोटा भाई सुनील मकर संक्रांति पर खिचड़ी देने बहन की ससुराल पहुंचा. सुनील ने जब मुख्य द्वार खटखटाया तो वह अपनेआप  खुल गया. अन्दर पहुंचने पर सुनील को जब कोई दिखाई नहीं दिया तो वह छत पर बने कमरे में गया. कमरे में कदम रखते ही सुनील की चीख निकल पड़ी. बहन उमा जली अवस्था में अचेत पड़ी थी. सुनील ने शोर मचाकर पड़ोसियों को एकत्र  किया और उनकी मदद से बहन उमा को उर्सला अस्पताल में भारती कराया. उमा के परिजनों ने ससुरालवालों के खिलाफ़ चकेरी थाने में तहरीर दी है. सुनील ने आरोप लगाया कि शादी के बाद से ही उमा के ससुरालवाले दहेज़ में तीस हज़ार रुपए और मांग कर रहे थे. मांग पूरी न होने पर उमा का उत्पीड़न करने लगे. शादी के दो साल बीत जाने पर ससुरालवाले उसे बच्चा न होने का ताना भी देने लगे और मारपीट करने लगे. पति राजेन्द्र दूसरी शादी की धमकी भी देने लगा. सुनील का आरोप है कि दहेज़ और बच्चे के लिए उसकी बहन उमा को ससुरालवालों ने मिट्टी का तेल डालकर जाला दिया.
                                ( स्रोत: राष्ट्रीय सहारा,१२-०१-१० )





आज राष्ट्रीय युवा दिवस है. स्वामी विवेकानंद जी का जन्म दिन है. भारत सरकार ने आज के दिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाने कि घोषणा की है. उपरोक्त दोनों घटनाओं के मुख आरोपी युवा जगत से ताल्लुक रखते हैं. बढ़ते भौतिकवाद, बाजारवाद और वैश्वीकरण के सबसे ज्यादा शिकार युवा जगत ही है. जिस मुल्क की सत्तर प्रतिशत से ज्यादा आबादी युवा है, उस मुल्क की बहन, बेटियां सुरक्षित नहीं है. यह एक विचारणीय मुद्दा है. सिर्फ सांस्कृतिक आयोजनों से राष्ट्रीय युवा दिवस की सार्थकता सिद्ध नहीं होगी.
कहीं किसी की बेटी जला दी जाती है, कहीं किसी की बहन के साथ बलात्कार होता है. राह चलते लड़कियों पर अभद्र शब्द-बाण चलाए जाते है. इन सब बुरी हरकतों में भारत के उसी सत्तर फीसदी युवा पीढ़ी के नुमाइंदे लिप्त होते हैं. फिर कैसे मनाएं हम राष्ट्रीय युवा दिवस ? काहे का राष्ट्रीय युवा दिवस ? यह तो सरासर स्वामी विवेकानंद के उसूलों के साथ बलात्कार होगा. उनकी छवि धुल धूसरित होगी.
उपरोक्त दोनों घटनाओं को प्रस्तुत करने का मेरा मकसद सिर्फ इतना है कि ऐसी घटित होने वाली घटनाओं में प्रमुख भूमिका युवाओं की ही होती है. युवाओं को अपनी भूमिका का नए सिरे से मूल्यांकन करना होगा. ये आग वो आग है जो मुद्दतों से हमारे परिवार और समाज को जलाती आ रही है. ये आग कब बुझेगी....?? इस सवाल का जवाब हम राष्ट्रीय युवा दिवस के मौके पर ढूंढ सके तो उचित होगा. सही मायनों में तभी विवेकानंद जयंती अपने राष्ट्रीय युवा दिवस की सार्थकता को सिद्ध कर पाएगी. हम सत्तर फीसदी से अधिक भारतीय युवा आज मिलकर ये शपथ लें कि भविष्य में किसी की बहन, बेटी और माँ दहेज़ और बच्चे के लिए आग में न जलने पाए.
अंत में भारत के नौजवानों का आह्वान करती मेरी ये ग़ज़ल....
नौजवां हो तो ज़ख्मे-वतन की दवा बनो
ढलती शबे-चश्म के लिए सहर बनो.
बेज़ा उठती वहशी तमन्नाओं और
वहशी आवाज़ों के लिए कहर बनो.
गरम है तुम्हारी रगों का खून जो
लंगड़ों की लाठी, अंधों के लिए नज़र बनो.
गरजते बादल, बरसते बादल से बचने को
नादान परिंदों के लिए शज़र  बनो.
अधूरे रिश्ते के राहों को मंजिल मिले 
उस रास्ते के रिश्तों के लिए हमसफ़र बनो.
जिस नज़र से चाहते हो दुनिया देखे 
उस दुनिया की " प्रताप " पहले नज़र बनो.

जय हिंद...!
प्रबल प्रताप सिंह


Monday, January 11, 2010

हम बेज़ुबां भी दिमाग रखते हैं....!















मैं प्रतिदिन दो बार  दांत साफ़ करती हूं.












ठण्ड में मैं भी गर्म कपड़े पहन के निकलता हूं.












साल में दो बार दांतों के डाक्टर से अपना दांत चेक करवाता हूं.

















मैं प्रतिदिन सनबाथ लेता हूं.


 जब मैं गहरी नींद में होता हूं 
तो मेरे ऊपर कौन सो रहा है, पता नहीं चलता.












मैं हमेशा कार और हवाई जहाज़ में 
अपने को सीट बेल्ट से बांधकर रखता हूं.



पीने के बाद मैं भी मौज करता हूं.


मैं ऐसे ही हंसता हूं.



 भूख से ज्यादा नहीं खाती हूं.



 रोज नहाती हूं.


दिमाग को दुरुस्त रखने के लिए रोज पढ़ती हूं.


 दोस्त मुझे बहुत प्यार करते हैं.















मुझे काली चाय अच्छी लगती है.




 इंसानों की बढ़ती आबादी के कारण 
टॉयलेट को हम साझा कर काम चलाते हैं.















शरीर को फिट रखने के लिए हम रोज़ाना व्यायाम करते हैं.













ज्यादा पढ़ाई से मेरी आँख की रौशनी कम हो गई है.


  स्वस्थ जीवन का आधार शाकाहार, 
इसलिए हम शाक-पात खाते हैं.




 लोग मुझे स्टाइल में पसंद करते हैं, 
इसलिए मैं स्टाइलिश कपड़े पहने रहता हूं.
















मुझे गुस्सा नहीं आता क्योंकि मैं गुस्सा दूर करने के लिए बाबा 
रामदेव के बताए प्राणायाम करता हूं.
















मेरे मालिक मुझे जहां सुलाते हैं मैं वहीं सो जाता हूं.













कोई भी सुअवसर हो हम सब एकजुट होकर खूब मौज-मस्ती करते हैं.


















मुझे संगीत से गहरा लगाव है, जब घर के काम से फुरसत
मिलती है तो मैं संगीत का आनंद लेती हूं.














मुझे अपने बच्चों से बहुत प्यार है.

प्रबल प्रताप सिंह


Friday, January 1, 2010

नव वर्ष मुबारक....!










































चटकती कलियों को
किलकती गलियों को
नव वर्ष मुबारक....!

नील गगन के बादल को
ममता के आँचल को
नव वर्ष मुबारक....!


पूरब की पुरवाई को
सागर की गहराई को
नव वर्ष मुबारक....!


अनेकता के साथों को
एकता के हाथों को
नव वर्ष मुबारक....!

पतझर की बहार को
माटी के कुम्हार को
नव वर्ष मुबारक....!

बचपन की बातों को
बिछुड़े हुए नातों को
नव वर्ष मुबारक....!

झुकती हुई आँखों को
सूखी हुई शाखों को
नव वर्ष मुबारक....!

पूर्वजों की थाती को
शहीदों की छाती को
नव वर्ष मुबारक....!

छप्पर की बाती को
चींटी-बाराती को
नव वर्ष मुबारक....!

उठती डोली को
पपिहा की बोली को
नव वर्ष मुबारक....!
 
शहर की अंगड़ाई को
गाँव की बिवाई को
नव वर्ष मुबारक....!

बुजुर्गों के सानिध्य को
भारत के भविष्य को
नव वर्ष मुबारक....!

अलाव की रातों को
बसंत की यादों को
नव वर्ष मुबारक....!

गुजरती राहों को
बिचुद्ती बाँहों को
नव वर्ष मुबारक....!

गाँव की पगडण्डी को
सब्जी की मंडी को
नव वर्ष मुबारक....!

खेतों की फसलों को
चिड़ियों के घोसलों को
नव वर्ष मुबारक....!
 
रोते नादानों को
उड़ते अरमानों को
नव वर्ष मुबारक....!

निकलते दिनकर को
स्थिर समंदर को
नव वर्ष मुबारक....!

कोयले की खानों को
मुर्गे की बांगो को
नव वर्ष मुबारक....!

नदिया की कल कल को
गोरी की छम छम को
नव वर्ष मुबारक....!

सरहद के जवानों को
खेत खलिहानों को
नव वर्ष मुबारक....!

जीवन दाता को
जग के विधाता को
नव वर्ष मुबारक....!


 







 
प्रबल प्रताप सिंह