Monday, December 7, 2009

कोपेनहेगन क्या होपेनहेगन बन पाएगा....?


















































































दिन सोमवार तारीख सात है आज. डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में दुनियाभर  के पर्यावरण प्रेमियों का जमावड़ा लगा है. सात से अट्ठारह दिसम्बर तक जलवायु में बढ़ते जहर को कम करने की योजना - परियोजना पर चर्चा होगी. तापमान बढ़ने से पिघलते ग्लेशियरों का पानी समुद्र में समा रहा है. नतीजतन विश्व के तमाम देशों के कई तटीय शहरों के डूबने का खतरा पैदा हो गया है. कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएं नियमित अंतराल पर सामने आ रहीं हैं. परिणामस्वरूप निर्दोष जिन्दगियां काल के गाल में समा रहींहैं. जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा १९९२ में रियो दी जिनेरियो ( ब्राज़ील ) में आयोजित पृथ्वी सम्मेलन की यह सबसे अद्यतन और महत्वपूर्ण कड़ी है. खबर है की जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों से निपटने के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता होना तय हुआ है. यह समझौता क्या होगा ? कैसा होगा ? पर्यावरण प्रदूषण को रोकने में कितना कारगर होगा ?  यह  सम्मेलन की समाप्ति के बाद पता चलेगा.





























जलवायु परिवर्तन मतलब लम्बी समयावधि के बाद तापक्रम में बदलाव. मनुष्य की विलासितापूर्ण जीवनशैली, उद्योग व वाहनों से निकलने वाला धुंआ और घटतेय वन्य क्षेत्र के कारण ग्रीनहाउस गैसों का प्रभाव बढ़ रहा है. इसमें कार्बन डाई ऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और जलवाष्प शामिल हैं. कभी पृथ्वी की उत्पत्ति में सहायक रहीं ये गैसें अब इसके तापमान में खतरनाक तरीके से बढ़ोत्तरी कर रहीहैं.













 जलवायु परिवर्तन संधि पर १९२ देशों के हस्ताक्षर हैं. इन १९२ देशों और सरकारों के मुखिया के साथ - साथ तीस हजार लोगों को आमंत्रित  किया गया है. लेकिन पन्द्रह हजार लोगों के बैठने की व्यवस्था होने के कारण कम लोगों के आने की सम्भावना है. इस सम्मलेन का एजेंडा यह है कि इसमें विकसित और औद्योगिक देश २०२० तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भारी कटौती लाने की घोषणा करें तथा विकासशील और गरीब देशों को इन खतरों से निपटने के लिए आर्थिक और तकनीकी मदद देने का ऐलान करें. बाद में इस समझौते को २०१० में एक अंतर्राष्ट्रीय संधि का रूप दिया जाएगा, जिसके चलते इसके प्रावधानों को मानने की बाध्यता होगी.









भारत और चीन जैसे विकासशील देश का मानना है कि कार्बन उत्सर्जन में स्पष्ट कटौती की जिम्मेदारी औद्योगिक और धनाड्य देशों की है. क्योंकि काफी लम्बे अर्से से ये देश ज्यादा मात्रा में जलवायु को क्षति पहुंचा रहे हैं. इन देशों को पहले कटौती कर उदहारण पेश करें. गौरतलब है कि १९९७ में क्योटो प्रोटोकाल के दौरान तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने पांच फीसदी कटौती को अमेरिकी अर्थव्यवस्था को चौपट कर देने वाला बताया था.
कौन कितना कार्बन कटौती करेगा















भारत - २०५० तक - २० से २५%
चीन - २०२० तक - ४० से ४५%
अमेरिका - २०२० तक - १५%
ब्राज़ील - २०२० तक - ३६%
योरोप - २०२० तक - २० से ३०%
इंडोनेशिया - २०२० तक - २६%








विगत दिनों दिल्ली बेमौसम के कोहरे में घिरी दिनभर धुंध छाई रही. महाराष्ट्र और गुजरात में समुद्री तूफ़ान आने की खबर सुनाई दी. पूरे देश में इस साल सूखा पसर गया, अचानक बारिश शुरू हो गयी. मौसम की आख-मिचौली से आम आदमी हैरान और परेशान है. मौसम विज्ञानी भी इस तरह की अप्रत्याशित घटनाओं से चिंतित हैं. औद्योगिकीकरण के परिणामस्वरूप धरती के वायुमंडल में कार्बन डाई ऑक्साइड और एनी जहरीली गैसों की मात्रा दिनों-दिन बढती जा रही है, जिसके कारण धरती के तापमान में अप्रत्याशित तरीके से बढ़ोत्तरी हो रही है.
कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन देशों  में( प्रति व्यक्ति, टन में )












अमेरिका - २६.६
योरोपीय दश - ९.४०
जापान - १३
चीन - ४.७
रूस - १०
भारत - १
पर्यावरण को प्रदूषित करती गैसें( प्रतिशत में )
कार्बन डाई ऑक्साइड - ५८%
(जैविक ईंधन)
कार्बन डाई ऑक्साइड - १६%
(वन विनाश)
मीथेन - १७%
नाइट्रस ऑक्साइड - ८%
पर्यावरण परिवर्तन पर प्रधानमंत्री की सलाहकार परिषद् के बनने और पर्यावरण परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्ययोजना यानी एनएपीसीसी के गठन के साथ यह स्पष्ट कर दिया कि भारत जलवायु परिवर्तन पर प्रगतिशील कदम उठाने को कमर कसके तैयार है. 









एनएपीसीसी के अध्यक्ष डा. राजेन्द्र पचौरी का मानना है कि कई बरसों की कोशिश के बाद जिस रास्ते की सहमति बनी है वह आगे जरूर बढ़ेगी.










कोपेनहेगन सम्मलेन के बारे में भारत के पर्यावरण एवं वन राज्यमंत्री जयराम रमेश का कहना है, " हमें बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं रखनी चाहिए. ऐसा लगता है कि किसी अंतर्राष्ट्रीय समझौते पर पहुँचने से पहले लंबा समय लगेगा. यदि कोपेनहेगन में सिर्फ राजनीतिक लफ्फाजी होती है तो २०१० तक वेट करना पड़ेगा. " .
ग्रीनहाउस पैदा करने वाले क्षेत्र 





पावर स्टेशन ---------------------------------२१.३
औद्योगिक इकाई ----------------------१६.८
परिवहन ----------------------------१४.०
कृषि बाईप्रोडक्ट-----------------१२.५
जैविक ईंधन ---------------११.३
व्यपारिक स्रोत-----------१०.०
जल शोधन व कूड़ा निस्तारण ----३.४
बायोमास --------०








एक लीटर पेट्रोल के इस्तेमाल से पर्यावरण में चार किग्रा. कार्बन डाई ऑक्साइड पहुंचती है.
फिलिपीन्स लगातार तीन भीषण तूफानों से लगभग पूरी तरह तबाह हो चुका है. यही हाल ताइवान, वियतनाम और कम्बोडिया का भी है. फयां, अलनीनो, रीटा और कटरीना जैसे तूफानी जलजलों ने विश्व के कई देशों के शहरों को नुक्सान पहुंचाया है.











































 औद्योगिक युग (१७५०) के बाद ग्रीनहाउस गैसों में ९७% की वृद्धि हो गई है. ग्रीनहाउस गैसों के कारण धरती का तापमान १.५ डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है. ग्लेशियर १.५ की प्रतिवर्ष की रफ्तार से पिघल रहे हैं.














धरती गर्म हो रही है. इसे बचाने के लिए कोपेनहेगन में चल रही बैठक से क्या होपेनहेगन का उद्देश्य कामयाब होगा? विकसित और औद्योगिक देश ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भरी कटौती करने को तैयार होंगे?  हम उम्मीद करते हैं की इन सवालों के जवाब हमें सम्मेलन के समापन तक अवश्य मिल जाएंगे.




























जय हिंद....! 




प्रबल प्रताप सिंह

3 comments:

  1. हिन्दी ब्लॉगरी में ऐसे लेखों की कमी है। अच्छी पोस्ट।
    भोगवादी विकास की अवधारणा ने बहुत से ऐसी प्रक्रियाएँ शुरू कर स्थापित कर दी हैं जिनको रिवर्स करने के लिए बहुत ही दृढ़ इच्छाशक्ति और जनता को समझाने की आवश्यकता पड़ेगी। सवाल यह है कि क्या वैश्विक नेतृत्त्व इसमें सक्षम है? क्या वाकई रोकथाम और रिवर्सल के लिए ईमानदार है?
    आर्थिक विकास और रोजगार के मुद्दे भी इनसे जुड़े हुए हैं। बहुत जटिल सा मामला है। जाने क्यों भूटान जैसे छोटे देश से सीख लेने को मन करता है !

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  2. pratikria ke liey sumanji or girijesh rav ji aap dono logon ka bahut bahut dhanyvaad...!!

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